Skip to main content

जोड़े की आवाज़


कभी कभी दिमाग की नसों का धड़कना भी सुनाई देती है। घड़ी की टिक टिक की तरह बजती हुई। एक शांत शोर। सर्दी की एक शांत सुबह की तरह जब किसी अभौतिक बात पर सोच सकें। कि जैसे धूप में कुर्सी लगा कर बैठे हों और हाथ पर एक तितली मर्जी से आकर बैठ जाए। बिरंगी तितली। अपनी हर सांस के साथ पंखों को खोले और बंद करे। पंख जब खुले तो किसी कविता की किताब की जिल्द लगे। उनपर बनाने वाले की उम्दा कशीदाकारी हो। गोल गोल हाईलाटेड घेरे, साड़ी की काली किनारी, और थोड़ा ऊपर कभी नीला रंग घुलते तो कभी पीला... तो कभी रंगों में में कई रंग...। एक सपनीला संसार। जैसे पॉलिस करके खुद के रोज़ अपने घर से निकलती हो। अपने ऊपर की लिपस्टिक को और गाढ़ा करके लगाती हो। कभी जो हमारे उंगलियों को छू जाए एक कच्चा रंग हमारे हाथ पर रह जाए। उसका सिग्नेचर’.....  छूअन ऐसी जैसे किसी मेमने के कान.... कुछ चीज़ें सुभाव से ही हमारे मन को निर्मल बनाती हैं.....

कुछ के पंख ऐसे होतें हैं जैसे सफेदी जा रही दीवार पर बैठी हो। उसकी तंद्रा भंग हुई हो वो उड़ने के लिए अपने पंखों का गत्ता खोली ही हो कि उस पर सफेदी के छींटे पड़ गए हों।

कुछ के पंख ऐसे होते हैं - जैसे करारा कागज़ी दुपट्टा। हम अपने उंगली से उसका टटकापन महसूस कर सकते हैं। जैसे महबूबा के साथ साथ चल रहे हों... और उससे आधे इंच पीछे भी हों। और ऐसे में उसका दुप्ट्टा अपने दो उंगलियों में ढ़ील देते हुए ऐसे लपेटा हुआ हो, जिससे उनको कहीं से भी कसावट या खिंचाव पता न चले।

मैं इन दिनों उसी तितली के रंगों में गुम रहता हूं। वो उड़ कर चली गई है। लेकिन उस सुग्गा नाक वाली तितली के सुग्गापंखी दुपट्टे का रंग मुझपर छूट गया है। कभी भी फुर्सत में जब मैं जब उस रंग को छेड़ता हूं तो वह और फैलती है। जैसे धमकाती हो कि जैसा है रहने दो ज़रा भी और छूआ तो ये देखो मैं अपने डैने खोल रही हूं - उड़ जाने को।

Comments

  1. http://apnidaflisabkaraag.blogspot.com/2010/07/blog-post_31.html
    ये तुम थे? कि हो?

    चीजों को सूक्ष्मता से देखना बरकरार है...उनसे जिन्दगी के बारीक ताने बाने को जोड़ना भी. तुम्हारे लौट आने का मौसम कुछ देर ठहरे ऐसी उम्मीद करने को जी चाहता है.

    ReplyDelete

Post a Comment

Post a 'Comment'

Popular posts from this blog

उसने दिल पर चीरा लगाकर उसमें अपने होंठों का प्राणवान चुम्बन के बिरवे रोप दिए।

सौ तड़कती रातें हैं फिर एक मिलन का दिन है। एक हज़ार बद्दुआएं हैं, फिर नेमत की एक घनघोर बारिश है। बारिश कम है जीवन में, प्यास अधिक। इतनी अधिक कि कई बार बारिश के दिन भी प्यास नहीं बुझती। लगातार लगती प्यास हमें मारती है, पत्थर बनाती है। सूखे प्यास का नमी भरा एहसास बारिश वाले दिन ही होता है। दरअसल आज जब मेरी प्यास बुझ रही थी तब मुझे अपने प्यासे होने का सही अर्थ संदर्भ सहित समझ में आया। xxx उसका हाथ अपने हाथ में लिया तो एक ढाढस सा लगा जैसे कोई एक सक्षम व्यक्ति कारगर उपाय बता रहा हो। वो अनपढ़ जाने किस तरह की शिक्षित है कि वह मुझ जैसे अहंकारी में भी कृतज्ञता का भाव पैदा कर देती है। xxx हमने बहुत कोशिश की एक होने की। लेकिन इसी प्रयास में हमारा यह विश्वास पुख्ता हुआ कि हमें एक दूसरे की जरूरत हमेशा रहेगी और हम अधूरे ही रहेंगे। यहां तक कि जिस जिस चुंबन में हमने अपने आप को पूरा समेट कर एक दूसरे में उड़ेल दिया, वहीं वहीं हमें अपने विकलांगता का एहसास हुआ। xxx कोई मां बाहर अपने बच्चे को मार रही है। बच्चा ज़ोर ज़ोर से किकियाए जा रहा है। मां गुस्से में उसे और धुन देती है। बच्चे

समानांतर सिनेमा

            आज़ादी के बाद पचास और साथ के दशक में सिनेमा साफ़ तौर पर दो विपरीत धाराओं में बांटता चला गया. एक धारा वह थी जिसमें मुख्य तौर पर प्रधान सिनेमा को स्थान दिया गया. एक धारा वह थी जिसमें मुख्य तौर पर मनोरंजन प्रधान सिनेमा को स्थान दिया गया. इसे मुख्य धारा का सिनेमा कहा गया. दूसरी तरफ कुछ ऐसे फिल्मकार थे जो जिंदगी के यथार्थ को अपनी फिल्मों का विषय बनाते रहे. उनकी फिल्मों को सामानांतर सिनेमा का दर्जा दिया गया. प्रख्यात फिल्म विशेषज्ञ फिरोज रंगूनवाला के मुताबिक, “ अनुभूतिजन्य यथार्थ को सहज मानवीयता और प्रकट लचात्मकता के साथ रजत पथ पर रूपायित करने वाले निर्देशकों में विमलराय का नाम अग्रिम पंग्क्ति में है ” . युद्धोत्तर काल में नवयथार्थ से प्रेरित होकर उन्होंने दो बीघा ज़मीन का निर्माण किया, जिसने बेहद हलचल मचाई. बाद में उन्होंने ‘ बिराज बहू ’ , ‘ देवदास ’ , ‘ सुजाता ’ और ‘ बंदिनी ’ जैसी संवेदनशील फिल्में बनायीं . ‘ दो बीघा ज़मीन ’ को देख कर एक अमेरिकी आलोचक ने कहा था “ इस राष्ट्र का एक फिल्मकार अपने देश को आर्थिक विकास को इस क्रूर और निराश दृष्टि से देखता है, यह बड़ी अजीब बात

विलंबित ताल

हर ताल विलंबित है। हर कदम लेट है। कदम के रूप में एक पैर उठता है तो दूसरी ज़मीन पर रखने की दर लेट है। पेड़ों के पत्ते एक बार जब झूम कर बांए से दाएं जाते हैं तो उनका फिर से दांए से बांयी ओर जाना लेट है। आदमी घर से निकलने वाला था पर लेट है। स्टेशन से गाड़ी खुलने में लेट है। बहुत मामले रूके पड़े हैं और उनपर कार्यवाई लेट है। दफ्तर में टेबल से फाइलों का सरकना रूका है। चमत्कार होना रूका हुआ है। प्रेम होना तक मुल्तवी है। की जा रही प्रतीक्षा भी होल्ड पर है। बारिश रूकी हुई है। जाम से शहर रूका हुआ है। गाए जाने वाला गीत भी जुबां पर रूका है। किसी से कुछ कहना रूका है। किसी से झगड़ लेने की इच्छा रूकी है। किसी के लिए गाली भी हलक में रूकी हुई है। बाप से बहस करना रूक गया है। मां को घर छोड़कर भाग जाने की धमकी भी पिछले कुछ महीनों से नहीं दी गई है। लिखना रूका है। पढ़ना ठप्प है। जीना रूका पड़ा है। पेड़ों पर के पत्ते रूके हुए हैं। आसमान में चांद रूक गया है। किसी का फोन पर हैलो बोलकर रूकना, रूक गया है। कुछ हो रहा है तो उसका एहसास होना रूक गया है। सिगरेट जल्दी खत्म होना रूक गया है। बारिश अपने ब