Skip to main content

हमारे साथ रहो, न रहो।




कोई बेचैनी का परदा है जो रह रह कर हिल जाता है। खिड़की के उस पार से हवा की हिलोर उठ ही जाती है। धूल धक्कड़ से कमरा भर जाता है। इसे अपने हाल पर छोड़ दो तो हर सामान पर परत चढ़ जाती है। फिर इनके बीच से कोई सामान उठाना ऐसा लगता है हीरे की दुकान से पेंडेंट उठा रहे हों। इसी में से एक है तुम्हारी हेयर क्लिप। शार्क मछली की तरह खूंखार तरीके से दांत फाड़े हुए। अभी जिस एंगल से यह देख रहा हूं एक रूद्रवीणा रखी लगती है। ठहर गया हूं इसे देखकर। समय जैसे फ्रीज हो गया है। वक्त की सारंगी जैसे किसी नौसिखिए से एक पूरी पर अकेली तार पर अनजाने में ही बज गई हो और वह धुन दिल की टीस का तर्जुमा हो। वो धुन फिर नहीं लौटता। जानता हूं कि तुम भी दोबारा नहीं लौटोगी। दोबारा कुछ नहीं लौटता। हम फोटोकॉपी करने की कोशिश करते हैं, अपना प्रयास करते हैं और हू ब हू वैसा हो फिर से होने की कामना करते हैं। लेकिन दोबारा से वह करते हुए थोड़ा समझदार हो जाते हैं, नादानी जाती होती है। तुमने कैसा उजास भरा है मेरे अंतस में! एक समानांतर दुनिया ही खोज दी जहां हर अमूर्त वस्तु प्राणवान है। हर स्थूल चीज़ें चलती फिरती शय है। ऐसा लगता है जैसे खजाना पास ही है। एक अदृश्य सोता अब दिख ही जाने वाला है। उसकी आवाज़ दृश्य है। यहां हमारे पैरों की चर्र-पर्र की आवाज़ भी शोर लगता है। यहां हर कल्पना सच है। यहां हर सच जो अब तक मानते हुए आए हैं, एक सरासर झूठ है। मैं नहीं जानता कि इस रिश्ते का नाम क्या है। जो एक शब्द तुम्हारे मन में उपज रहा होगा वह इंसानी और साहित्यिक जगत का सबसे ज्यादा मिसकोट और मिस्यूज करने वाला संदर्भ बन गया। हमने उसकी गरिमा नष्ट कर दी है और उसे बेहद हल्का बना दिया है। हमने धरती, हवा, पानी सब दूषित किया, इसे भी। हम इसका नाम नहीं लेंगे।

 

Comments

  1. ऐसे ही आओ, पर लौट-लौट आना ज़रूरी है। फ़ेसबुक पर जो क़तरने हैं, उन्हें भी यहाँ ठेल तो बढ़िया रहेगा।

    ReplyDelete
    Replies
    1. 'तो' को पढ़ना 'दो'। बस अभी इतना ही।

      Delete

Post a Comment

Post a 'Comment'

Popular posts from this blog

उसने दिल पर चीरा लगाकर उसमें अपने होंठों का प्राणवान चुम्बन के बिरवे रोप दिए।

सौ तड़कती रातें हैं फिर एक मिलन का दिन है। एक हज़ार बद्दुआएं हैं, फिर नेमत की एक घनघोर बारिश है। बारिश कम है जीवन में, प्यास अधिक। इतनी अधिक कि कई बार बारिश के दिन भी प्यास नहीं बुझती। लगातार लगती प्यास हमें मारती है, पत्थर बनाती है। सूखे प्यास का नमी भरा एहसास बारिश वाले दिन ही होता है। दरअसल आज जब मेरी प्यास बुझ रही थी तब मुझे अपने प्यासे होने का सही अर्थ संदर्भ सहित समझ में आया। xxx उसका हाथ अपने हाथ में लिया तो एक ढाढस सा लगा जैसे कोई एक सक्षम व्यक्ति कारगर उपाय बता रहा हो। वो अनपढ़ जाने किस तरह की शिक्षित है कि वह मुझ जैसे अहंकारी में भी कृतज्ञता का भाव पैदा कर देती है। xxx हमने बहुत कोशिश की एक होने की। लेकिन इसी प्रयास में हमारा यह विश्वास पुख्ता हुआ कि हमें एक दूसरे की जरूरत हमेशा रहेगी और हम अधूरे ही रहेंगे। यहां तक कि जिस जिस चुंबन में हमने अपने आप को पूरा समेट कर एक दूसरे में उड़ेल दिया, वहीं वहीं हमें अपने विकलांगता का एहसास हुआ। xxx कोई मां बाहर अपने बच्चे को मार रही है। बच्चा ज़ोर ज़ोर से किकियाए जा रहा है। मां गुस्से में उसे और धुन देती है। बच्चे

समानांतर सिनेमा

            आज़ादी के बाद पचास और साथ के दशक में सिनेमा साफ़ तौर पर दो विपरीत धाराओं में बांटता चला गया. एक धारा वह थी जिसमें मुख्य तौर पर प्रधान सिनेमा को स्थान दिया गया. एक धारा वह थी जिसमें मुख्य तौर पर मनोरंजन प्रधान सिनेमा को स्थान दिया गया. इसे मुख्य धारा का सिनेमा कहा गया. दूसरी तरफ कुछ ऐसे फिल्मकार थे जो जिंदगी के यथार्थ को अपनी फिल्मों का विषय बनाते रहे. उनकी फिल्मों को सामानांतर सिनेमा का दर्जा दिया गया. प्रख्यात फिल्म विशेषज्ञ फिरोज रंगूनवाला के मुताबिक, “ अनुभूतिजन्य यथार्थ को सहज मानवीयता और प्रकट लचात्मकता के साथ रजत पथ पर रूपायित करने वाले निर्देशकों में विमलराय का नाम अग्रिम पंग्क्ति में है ” . युद्धोत्तर काल में नवयथार्थ से प्रेरित होकर उन्होंने दो बीघा ज़मीन का निर्माण किया, जिसने बेहद हलचल मचाई. बाद में उन्होंने ‘ बिराज बहू ’ , ‘ देवदास ’ , ‘ सुजाता ’ और ‘ बंदिनी ’ जैसी संवेदनशील फिल्में बनायीं . ‘ दो बीघा ज़मीन ’ को देख कर एक अमेरिकी आलोचक ने कहा था “ इस राष्ट्र का एक फिल्मकार अपने देश को आर्थिक विकास को इस क्रूर और निराश दृष्टि से देखता है, यह बड़ी अजीब बात

विलंबित ताल

हर ताल विलंबित है। हर कदम लेट है। कदम के रूप में एक पैर उठता है तो दूसरी ज़मीन पर रखने की दर लेट है। पेड़ों के पत्ते एक बार जब झूम कर बांए से दाएं जाते हैं तो उनका फिर से दांए से बांयी ओर जाना लेट है। आदमी घर से निकलने वाला था पर लेट है। स्टेशन से गाड़ी खुलने में लेट है। बहुत मामले रूके पड़े हैं और उनपर कार्यवाई लेट है। दफ्तर में टेबल से फाइलों का सरकना रूका है। चमत्कार होना रूका हुआ है। प्रेम होना तक मुल्तवी है। की जा रही प्रतीक्षा भी होल्ड पर है। बारिश रूकी हुई है। जाम से शहर रूका हुआ है। गाए जाने वाला गीत भी जुबां पर रूका है। किसी से कुछ कहना रूका है। किसी से झगड़ लेने की इच्छा रूकी है। किसी के लिए गाली भी हलक में रूकी हुई है। बाप से बहस करना रूक गया है। मां को घर छोड़कर भाग जाने की धमकी भी पिछले कुछ महीनों से नहीं दी गई है। लिखना रूका है। पढ़ना ठप्प है। जीना रूका पड़ा है। पेड़ों पर के पत्ते रूके हुए हैं। आसमान में चांद रूक गया है। किसी का फोन पर हैलो बोलकर रूकना, रूक गया है। कुछ हो रहा है तो उसका एहसास होना रूक गया है। सिगरेट जल्दी खत्म होना रूक गया है। बारिश अपने ब