दादा साहब फालके की फिल्में की सफलता को देखकर कुछ अन्य रचनात्मक कलाकारों में भी हलचल मचने लगी थी। 1913 से 1918 तक फिल्म निर्माण सम्बंधी गतिविधियां महाराष्ट्र तक ही सीमित थी। इसी दौरान कलकत्ता में हीरालाल सेन और जमशेद जी मदन भी फिल्म निर्माण में सक्रिय हुए। फालके की फिल्में जमशेद जी मदन के स्वामित्व वाले सिनेमाघरों में प्रदर्शित होकर खूब कमाई कर रही थीं। इसलिए जमशेद जी मदन इस उधेड़बुन में थे कि किस प्रकार वे फिल्में बनाकर अपने ही थिएटरों में प्रदर्शित करें। 1919 में जमशेदजी मदन को कामयाबी मिली जब उनके द्वारा निर्मित और रूस्तमजी धेतीवाला द्वारा निर्देशित फिल्म ' बिल्म मंगल ' तैयार हुई। बंगाल की पूरी लम्बाई की इस पहली कथा फिल्म का पहला प्रदर्शन नवम्बर , 1919 में हुआ। जमदेश जी मदन ( 1856-1923) को भारत में व्यावसायिक सिनेमा की नींव रखने का श्रेय दिया जाता है। वे एलफिंस्टन नाटक मण्डली के नाटकों में अभिनय करते थे और बाद में उन्होंने सिनेमाघर निर्माण की तरफ रूख किया। 1907 में उन्होंने ...
I do not expect any level of decency from a brat like you..

सागर...अथाह...अनंत...अबूझ.
ReplyDeleteगहराई जहां रौशनी की किरण भी न पहुंचे ऐसा कुछ है जो तुम में करवटें लेता रहता है.
सागर साहब...सलाम!
स्पीचलैस..
ReplyDeleteदेवकी की आंठ्वी संतान... क्या बात है जानी..!
गुरु बैठे तो हम भी ऑफिस में है ! पर आज भटक नहीं पा रहे.
ReplyDeleteसंवेदनशील रचना।
ReplyDeleteदुनिया चार पैसे के लिए मर रही है और हम यहाँ चार लम्हे के लिए
ReplyDeleteअपना हीं ज्ञान हडकंप मचाता है
मेरे मन में आते विचार देवकी की आठवी संतान क्यूँ नहीं हो जाते...
सही है.. और अंतिम वाला तो एकदम सोंच से परे
'सोचालय'- सोच कर रखा है भाई नाम !
ReplyDeleteअद्भुत ! सोच कहीं आ सकती है, कहीं से आ सकती है ।
अपने लिये कहूं -
"आ नो भद्रा क्रतवो यन्तु विश्वतः..."
यहां से भी !
जैसे किसी खुदाई में मिली पत्थर पे खुदी या फिर किसी लेखक की अनछपी रचना हो कोई..
ReplyDeleteलिखे शब्दों पे फेरी लकीर अजीब सी मनोस्थिति बनाती है.(सभी लोग मिट जायेंगे)
आपकी सुपरिचित सम्मोहक शैली में लिखी शानदार रचना.
बढ़िया अभिवियक्ति बधाई
न खाते गेंहूँ, न निकलते खुल्द से बाहर
ReplyDeleteजो खाते हजरते-आदम ये बेसनी रोटी
:-)
ऑफिस में बस कीजिए उतना सा ही काम, नौकरी चलती रहे ,शरीर करे आराम!
ReplyDelete:) कमाल है साहब..जवाबदेही तो बनती है..लगता है रेगुलर करवा करके ही छोडेगे आप..
आशा है ऐसे कई उड़ते हुए पन्ने ब्लॉग पर आ गिरेंगे !
ReplyDeleteजब तुम्हारी बातेँ मेरी बातेँ होती हैँ तो यह कविता है. जब यह मेरी बातेँ नहीँ होती तो पहेली.
ReplyDeleteसत्या
बहुत सुन्दर! राइटिंग भी बुरी नहीं है भैये! जय हो!
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