Skip to main content

सूखे लकड़ी चूल्हे में डालती रहना


Comments

  1. दिल भर आता है, कुछ कहना चाहती हूँ पर बात कहीं मन में डबडबा रही है, लहरों पर हिचकोले खाती नाव जैसी...
    क्या लिखते हो, कैसे लिखते हो...

    ReplyDelete
  2. मुझे भी कल भरने की जल्दी नहीं, आज में डूबने की व्यग्रता है। यह भाषा बनी रहने दें, पीढ़ियों के काम आयेगी।

    ReplyDelete
  3. पहले फेसबुक, बज्ज़ और अब सोचालय पर भी... आपकी कलम है कि तलवार... क़त्ल-ए-आम मचा रखा है आजकल... ख़ुदा ख़ैर करे !!

    ReplyDelete
  4. बात इन पंक्तियों से बहुत परे और गहरे होने का इशारा करती हैं.बहुत बढ़िया.अब इसे क्यों न यहाँ टाइप कर लिया जाए?

    ReplyDelete
  5. कौन कहता है यह एक खूबसूरत कविता नहीं है?

    ReplyDelete

Post a Comment

Post a 'Comment'