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सम्मन जारी किया गया

पुराने किले से सदा आती है। हवा उन दीवारों को छूते हुए आती है, किसी घुमावदार सुरंग तो तय करती। हवा इनमें जब भी घुसती या निकलती है मानो को काई अजगर पैठ या निकल रहा हो। बहुत सारा वज़न लिए। मुहाने पर निगरानी करता नीम का पेड़ बारिश का पानी पी कर मदमस्त हो चला है। तने ऐसे सूजे हैं जैसे किसी नींद में एक पुष्ठ छाती वाली  औरत लेटी हो जिसके बच्चे ने उसका ब्लाउज सरका दूध मन भर पिया हो।  xxxxx पीपल के पत्ते की तरह नज़र आते हैं कुछ लोग। अपनी जगह पर हिलते, हवा के चलने पर सरसराते। हवा कोई खबर लिए पेड़ में घुसती है और तने को पनघट मान सारे पत्ते एक दूसरे से सटकर वो खबर सुनने गुनने लगते हैं। ये बड़े क्षणिक पत्ते हैं। जीते जागते हुए भी एक मरियल हथेली से। अपनी जड़ों से तुरंत उखड़ आने वाले। एक दिखावटी टा टा करता, हिलता कोई हाथ। पलट कर देखो तो ऐसा ही लगे कि किसी अपने की तलाश में पराए घर में आया था। मेहमान होते हुए खुद खर्च किया और जाते वक्त पूरा घर लाज लिहाज के मारे हाथ रूख्स्त कर रहा हो।  xxxxx एक दयनीय सी स्थिति यह है कि हमारे चारो ओर दलदल है, पीठ के नीचे कांटे हैं, दिमाग में रेंगता ...

अपने ही दिल से उठ्ठे, अपने ही दिल पर बरसे

जैसे खिजाब लगा कर तुम्हारे साथ इस उम्र में नाचने की गुज़ारिश की हो, एक लम्बा वक़्त बीता लेकिन हमारे बीच की खाई पर ये किसने कामगार लगाये ? हम कहने, दिखने और लगने को पति पत्नी हैं लेकिन तुम मुझसे बड़ी ही रह गयी, मैं खूँटी पर पर टंगा याचना ही करता रहा,  एक आत्मसम्मानी भुक्तभोगी जिसने  एक जीवन भर  आत्मसम्मान लटका दिया, विवाह से सत्रह साल होने को आये लेकिन रास्ते में करबद्ध खड़ा एक स्वागत कर्मी लगता हूँ, मुद्रा प्रणाम की है लेकिन उसी में सबको रास्ता भी दिखाना हो रहा है, तुम्हारी पेंचदार जुल्फें नसीब हैं लेकिन किराए का लगता है. चूम सकता हूँ लेकिन  पराया महसूस होता है. प्रतिक्रिया में कई बार वो कम्पन, वो सिसकारियां नहीं मिलती और तो और जब लम्बे प्रवास पर जाता हूँ तो आँखों में वो पुलकित और उमड़ता नेह भी नहीं दीखता.  एक ज़ालिम ज़माने से लड़ना क्या कम था, एक बे-इज्ज़त करता समाज क्या कम था जो पाँव तले नाव की पाट भी डगमगाती हुई लगती है ?  खुद से बहुत ऊब कर और ग्लानि में कभी गले भी लगती हो तो समझता हूं कि इस तरह मिलना एक आदरपूर्वक गले लगना है। हद है कि मैं बनावट हमेश...

अलखि, तुम्हारे अक्षर तो सुग्गा मैना के कौर से लगते हैं !

ज़मीन पर बोरा बिछा, अलखि उस पर पालथी मार कर बैठी है। दोपहर चार बजे का समय है। धूप छप्पर पर से वापस लौट रही है। आंगन के बाईं ओर गोशाला है और दाहिनी तरफ मिट्टी से घिरे किंतु थोड़ी ऊंचाई पर गिलावे पर ईंट से घेरा पूजा स्थान। इसपर गोबर से लिपाई की हुई है। बीच में हनुमान जी की ध्वजा है जो हर साल रामनवमी पर बदली जाती है। अलखि ऊपर देख कर सोचती है। अभी-अभी तक तो नया था क्योंकि चैत्र गुज़रे ज्यादा दिन नहीं हुए हैं लेकिन रंग थोड़ा धूसर हो रहा है। एक बारिश गिरेगी ना, तो ध्वजा का लाल रंग और हल्का हो जाएगा। सफेद, उजला आकाश कितना सूना है। लगता है खराब हो गए कपास रखे हों।  बोरे पर पिचहत्तर फीसदी जगह घेर कर अलखि बैठी है। शेष पच्चीस प्रतिशत स्थान पर उसकी किताब कॉपी है। कॉपी क्या है एक नमूना है। अगर पलट कर देखी जाए तो मालूम होता है जैसे नितांत उलझन में लिखी गई हो। जैसे कोई जवान लड़का किसी किशोरी को प्रपोज़ कर रहा हो तो शर्म और उलझन में जो आरी तिरछी लकीरें खिचेंगी, उसकी पूरी कॉपी  कुछ ऐसी ही लगती है लेकिन ठहरिए जिसे आप इस कुंवारे और अनछुए रूपक द्वारा तौल रहे हैं अगर अलखि के पास यह उदाहरण रख ...

अमलतास, गुलमोहर और चाँद के देस में गुम एक जाति

ए तुम्हारे शहर में कोई और लड़की देखना अपने आप में क्या कुछ है। समझौता, मजबूरी, गुस्सा, बदला या कि तुमको फिर से तलाश करना। रिडिस्कवरी। दो गुदाज बाहें जब नंगी हथेलियों में थरथराए, तेज़ तेज़ सांसों का उतार चढ़ाव से ज्यादा हो, चढ़ाव इसलिए कि उतार एकाग्र हो, चढ़ाव इसलिए कि उतार में खत्म होना हो, चढ़ाव इसलिए कि उतार को जी सकें, प्यास बुझा सकें। बेकाबू धड़कनों का आरोह अवरोह किसी सनकी खूनी के तरह दलदल में चमकीले खंज़र लेकर उतर आए तो सीने पर उठता गिरता चांदी का चेन जिस जिस उलझन टकराता हो। इससे इतर तुम्हारे बगैर सोचना क्या है ? बिना गुलमोहर के पाटलीपुत्रा की कल्पना, बिना बेलपत्र महाशिवरात्रि का दिन या कि बिना भांग के होली। एल ठंढ़ी बहुत ठंढ़ी... कोई बर्फ का टुकड़ा स्मृति में फूटता, बारिश वाले दिन में ढ़लान भरी बिजली के तारों पर ढ़कलती चमकीली बूंद, कहीं पलते हुए जब हम बड़े होते हैं अमुक अमुक स्थान के कारण वो शहर हमें याद नहीं होता बल्कि अपने बेतरतीब ढलानों में भी सौंदर्य छिपाए होता है। अपना शहर कोई तीर्थ स्थल नहीं होता जो स्थान विशेष के कारण याद रहे। वहां विपरीत दिशा से आ रही आॅटो में दो...

यही आगाज़ था मेरा, यही अंजाम होना था...

-1- -2- प्यार में कुछ नया नहीं हुआ, कुछ भी नया नहीं हुआ। एहसास की बात नहीं है, घटनाक्रम की बात है। हुआ क्या ? चला क्या ? वही एक लम्बा सा सिलसिला, तुम मिले, हमने दिल में छुपी प्यारी बातें की जो अपने वालिद से नहीं कर सकते थे, सपने बांटे और जब किसी ठोस फैसले की बात आई तो वही एक कॉमन सी मजबूरी आई। कभी हमारी तरफ से तो कभी तुम्हारी तरफ से। सच में, और कहानियों की तरह हमारे प्यार की कहानी में भी कुछ नया नहीं घटा। प्यार समाज से पूछ कर नहीं किया था लेकिन शादी उससे पूछ कर करनी होती है। घर में चाहे कैसे भी पाले, रखे जाएं हम उससे मां बाबूजी और खानदान की इज्ज़त नहीं होती मगर शादी किससे की जा रही है उस बात पर इज्ज़त की नाक और बड़ी हो जाती है। कोई दूर का रिश्तेदार था जो मुझ पर बुरी नज़र रखता था। मैंने शोर मचाया तो खानदान की इज्ज़त पैदा हो गई। और जब अपने हिसाब से जांच परख कर अपना साथी चुना फिर भी इज्ज़त पैदा हो गई। बुरी नज़र रखने वाला खानदान में था इससे इज्ज़त को कोई फर्क नहीं पड़ा लेकिन एक पराए ने भीड़ में अपने बांहों का सुरक्षा घेरा डाला तो परिवार के इज्ज़त रूपी कपास में आग लगने लगी। और प्यार...

याद तेरी कभी दस्तक, कभी सरगोशी से...

टेबल कवर पर हाथ फेरो तो हथेली से धूल चिपकती है। हिन्दी व्याकरण की किताब खोजने ज़मीन पर समतल ना बैठ पाने वाले स्टूल पर चढ़कर खोजने की कोशिश की तो मंझले रैक से कितने तो रील वाली आॅडियो कैसेट गिरने लगे। सनसेट प्वांइंट, सिफर से लेकर वीर- ज़ारा तक के। एक भी कैसेट पर उसका सही कवर नहीं लगा है। शादी के गीतों वाली कैसट में मुकेश का गोल्डन कलेक्शन है और जगजीत सिंह वाले कवर में यूफोरिया। एक इंसान में भी ऐसी ही बेवक्त, बदतमीज़ और अनफिट ख्याल भरे रहते हैं।  02.09.1995 के बाद से घर में कुछ नहीं बदला है। एक ट्रंक रखा है अंदर वाले कमरे के कोने में, उसके बगल में चार-चार ईंटों पर खड़ा आलमारी, बची हुई जगह पर मच्छर अगरबत्ती का स्टैण्ड, किसी टेढ़े कांटी पर मुंह फुलाया रूठा लालटेन लटका है। बचपन में जब लाइट कटती थी तो भाई बहन इसी लालटेन के दोनों तरफ बैठ कर मच्छरों, अंधेरों और बिहर खेतों से आती झींगुर की आवाज़ों के बीच पढ़ाई करते। रोशनी सिर्फ सामने होता। दोनों के पीठ पीछे पसरा मीलों का अंधेरा। भाई के आगे एक किताब होती उसके बाद लालटेन फिर एक किताब और आखिर में बहन। इसका ठीक उल्टा क्रम बहन की तरफ से भी हो...

बदहवासी में भागना, पहचाने पेड़ों से टकराना और गिरना...

लड़की वो जिसका अगला कदम क्या होगा ये पता न हो। लड़की वो जो किस करवट बैठेगी इसका अंदाजा न हो। लड़की वो जो मासूम चेहरा बनाकर चीख उठे। लड़की वो जो इतनी बेपरवाह कि बाल, दुपट्टा और हंसी उड़ी जा रही हो और यह न सोचे कि इनसे कैसे अनमोल हीरे मोती गिरे जा रहे हैं और इसे बचा कर रखना चाहिए। लड़की वो जो इतनी नासमझ कि छत से नीचे आती बीच सीढ़ी पर सबसे बचकर चूम लो तो चिल्ला उठे कि - ''मम्मी देखो इसने मुझे यहां सीढ़ी पर छुपकर जबरदस्ती किस किया।'' लड़की वो जो पैदाइशी कलाकार हो, हर सुबह उसका बदल यूं जैसे केले के नए पत्ते गोल गोल खुलते हैं। लड़की वो जिसकी दो आंखों में चूहे और खरगोश जैसी चलपता और गालों पर उगे सुनहरे रोएं जैसी हल्की नादानी हो। जो बार बार प्यार करने जैसी गलती पर मजबूर करे।  2011 की डायरी में यह दर्ज कर रहा हूं कि उन आंखों में अब किसी ताखे पर जलती डिबिया का कम रास में जलने जैसा संशय भी आ चुका होगा और थोड़ी बहुत अपनी थरथराती रोशनी की ज़द में दूर रखे किसी सामान के कद का हिलना डुलना भी। भौतिक चीजों की अभावों में नहीं होगी इससे बदन में उभार भी ऐसे आए होंगे जैसे मिट्टी के घरो की...