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विलंबित ताल

हर ताल विलंबित है। हर कदम लेट है। कदम के रूप में एक पैर उठता है तो दूसरी ज़मीन पर रखने की दर लेट है। पेड़ों के पत्ते एक बार जब झूम कर बांए से दाएं जाते हैं तो उनका फिर से दांए से बांयी ओर जाना लेट है। आदमी घर से निकलने वाला था पर लेट है। स्टेशन से गाड़ी खुलने में लेट है। बहुत मामले रूके पड़े हैं और उनपर कार्यवाई लेट है। दफ्तर में टेबल से फाइलों का सरकना रूका है। चमत्कार होना रूका हुआ है। प्रेम होना तक मुल्तवी है। की जा रही प्रतीक्षा भी होल्ड पर है। बारिश रूकी हुई है। जाम से शहर रूका हुआ है। गाए जाने वाला गीत भी जुबां पर रूका है। किसी से कुछ कहना रूका है। किसी से झगड़ लेने की इच्छा रूकी है। किसी के लिए गाली भी हलक में रूकी हुई है। बाप से बहस करना रूक गया है। मां को घर छोड़कर भाग जाने की धमकी भी पिछले कुछ महीनों से नहीं दी गई है। लिखना रूका है। पढ़ना ठप्प है। जीना रूका पड़ा है। पेड़ों पर के पत्ते रूके हुए हैं। आसमान में चांद रूक गया है। किसी का फोन पर हैलो बोलकर रूकना, रूक गया है। कुछ हो रहा है तो उसका एहसास होना रूक गया है। सिगरेट जल्दी खत्म होना रूक गया है। बारिश अपने ब...

देख तो दिल कि जां से उठता है

देख तो दिल कि जां से उठता है ये धुंआ कहां से उठता है कई बारी यह लगता है कि जैसे दिल पिछली रात ही जला दी गई बस्ती है जहां अगली सुबह हम राख चुनने जाते हैं। यादें हैं कि मरती नहीं, अनवरत सताती है। और जो भूलने की कोशिश करो तो कोसी नदी के सैलाब की तरह दोबारा ज्यादा खतरनाक तरीके से लौटती है। और अगर याद करने बैठो तो उनके संग बॉटल में लगे मनी प्लांट की तरह कोने निकलने लगते हैं। सिरा से सिरा जुड़ने लगता है और लत्तर बनने लगता है। कौन सी कानी कहां जाएगी और जाकर किससे मिल जाएगी कहना मुश्किल है।  हम अपने दिमाग की तरह कहानियों का उपयोग भी बदमुश्किल एक दो प्रतिशत ही कर पाते हैं। वजह - कहानियों के भीतर कहानी। कई सतहों पर कहानी। परत दर परत कहानी। चीज़ों को श्वेत और श्याम में अगर हम देखने का हुनर विकसित कर लेते हैं तो ज़रा सा ज्यादा महसूस करने की भावना हममें उन विषय वस्तु के प्रति सहानुभूति भी जगा जाती है।  यह हमारे महसूस करने की ही ताकत है कि हम बिना मजनूं हुए मजनू का दर्द समझ सकते हैं, बिना जेबकतरा हुए जेब काटने वालों की मानसिकता समझ सकते हैं। इसलिए हमें जजमेंटल नहीं हुआ...

हिसाब

आखिर क्या जोड़ता है हमें। हमारे अंदर का खालीपन। या एक दूसरे के अंदर जब्त दर्द को हम कुरेद देते हैं। ऐसे तो कोई हर्ट नहीं करता जैसे तुम मुझे कर देती हो। ऐसे तो कोई नहीं छूता जिससे मैं तुम्हारी राह में बिछ बिछ जाता हूं। ऐसे तो कोई इस्तेमाल नहीं करता कि इस्तेमाल होते वक्त तो तकलीफ होती है और तुम बेहद थकाती भी हो लेकिन उसके बाद यह सोच कर अच्छा लगता है कि मुझे तुम्हारे द्वारा ही इस्तेमाल होना है और तुम ही मुझे इस्तेमाल के दौरान सबसे अच्छा एक्सप्लोर कर पाती हो।  कभी कभी ऐसा लगता है जैसे किसी लंबी यात्रा पर जाने वाला हूं। या बिछड़ने वाला हूं तुमसे। या हमारे बीच कल को एक बेहद लंबी चुप्पी पसर जाएगी। कि हम एक दूसरे से बोलना बंद कर देंगे लेकिन एक दूसरे से हमारी उम्मीदें खत्म नहीं होंगी। लेकिन ये उम्मीदें हैं भी तो कैसी... एक दूसरे को याद करने की, मेरे लिखने की, तुम्हारी आवाज़ सुनने की, साथ समय बिताने की, जाने क्या क्या आपस में बातें करने की.... तुम्हें देख लेने की.... तुम्हारे लिए रोने की, तुम्हीं से हर्ट होने की....  कई बारी लगता है तुम किसी अजाने देस के अंचल में गाई जान...

प्रति-शोध

ऐसा लगा कि तुमने सरे बाज़ार मेरे जवान और कोमल सीने से दुपट्टा उड़ा दिया। उसी सीने का ख्याल कर तुम किसी अंतरंग पल मुझसे कहते थे कि तुम्हारा यह छुपा हुआ सीना मुझे शरीर बनाता है। आज सबके सामने जो तुमने यूं उघाड़ा तो मैं एक ही पल में जीते जी मर गई। लगा किसी ने तीन सेल वाली टार्च की बत्ती आंखों में ही जला दी। अंधी हो गई अपमान और शर्म के मारे।  मेरा कंधा झूठा होकर सिकुड़ गया था। एक स्त्रीसुलभ परदा। निर्लज्जता से लोहा लेती लाज। ऐसी लाज जो हारती नहीं बस बेबस महसूस करती है कि तुमने बराबरी से युद्ध नहीं किया। तुमने युद्ध के नियम तोड़े। दरअसल तुम्हें अपनी तय हार की जानकारी थी। तुम्हें पता था कि तुम देर तक टिक नहीं सकोगे। ऐसे में अपने मरदानेपन के खोखले अहंकार में चूर होकर तुम ऐसे चाल चलकर स्वयं को विजेता समझते हो। हर बार स्तंभन को तैयार तुम्हारा लिंग तुम्हें मदांध करता है। लेकिन, मैं पुर्ननवा हूं हर पल नई हो जाने वाली। चार ही दिन बाद जब मुझे किसी महफिल या जलसे में देखोगे तो तुम्हारे अंदर पलने वाली व्यस्नी मछली तड़प उठेगी। फिर वैसी ही हूक उठेगी। यह देखकर और तिल मिल मरोगी कि आज दु...

प्रतीक्षा

जीवन जीते जीते हम कितनी चीज़ों से मोह लगा बैठते हैं। ख्वाहिशें हैं कि कभी खत्म नही होती। हर मुहाने पर जाकर सोचते हैं कि काश थोड़ा और होता... कभी किसी रिश्ते में... कभी कोई मीठा सा लम्हा.... वक्त है कि ऐसे पलों पर भागा जाता है और रेशम पर रेशम की तरह फिसलता जाता है। हम यह सोचते हैं कि ज़रा और चलता।  हमारा दिल भी अजीब होता है। हम किसी न किसी मोड़ पर किसी न किसी को चांस देते हैं। कभी घटनाओं के दोहराव में तो कभी अनुभव के लिए तो कभी एक उम्मीद में जो हमारी आत्मा में रोशन राह भर दे। आत्महत्या करने के कई मौके आते हैं और अगर अभागे न हुए तो कोई दिलबर हमें फिर से मिलता है। हम खुद को प्यार के मौके भी देते हैं। कुछ कम देते हैं और मेरे जैसा आदमी ज्यादा देता है। दिल कभी नहीं भरता। यह शाश्वत भूखा और प्यासा है। हर वक्त थोड़ा और मोहलत मांगते हम न जाने कितनी ही घटनाओं, संबंधों, दृश्यों से अपना दिल जुड़ा लेते हैं और यह मोह हमारे लिए परेशानी का सबब बन जाता है। मैं यह क्यों लिख रहा हूं पता नहीं। मन में किसी स्तर पर शायद चल रही है यह बात इसलिए लिख रहा हूं। इसकी शुरूआत क्या है, क्यों है, और इसकी...

बी विद मी

शाम का सन्नाटा फिर से काबिज है। और मेरा मन तुम्हारी ओर लौटने लगा है। दिन भर काम कर लिया मैंने। आज कल तुम ही मेरी शराबखाना हो। दिन भर के बाद की ठौर हो। मैं भी कितना मतलबी हूं। दिन में कई बार याद आने के बाद भी कुछ नहीं कर पाता हूं। लेकिन शाम होते ही तुम्हारे ख्यालों से मुझे बीयर की महक आने लगती है। तुम्हारी तस्वीर देखता हूं तो लगता है जैसे मेले में अपनी सहेलियों से छूट गई लड़की हो। आंखों में वही लहक लिए कि जो भी मिलेगा तुम्हें तुम्हारे घर तक पहुंचा देगा। लेकिन मैं खुद भटका हुआ हूं घर से। खबर तो है मुझे कि तुम्हें कैसा लगता होगा लेकिन शायद पहुंचा नहीं सकूंगा। मैं तुममें अपना घर देखता हूं। तुम्हारे साथ शायद घर तलाशने की सोचूं मैं। तुम मिल तो गई हो मुझे लेकिन मुझे नहीं पता कि मुझे तुम्हारा करना क्या है। सिर्फ पाने खाने का नाम प्रेम नहीं है, अगर ऐसा होता तो मैं विजेता था। अच्छी बात यह है प्रेम में कि इसे दुनिया की नज़र से नहीं देख सकते हम। हमें एक दूसरे के लिए ही होना है।   एक दूसरे को समझने को भी जरूरी नहीं मानता मैं। बस जस्ट बी विद मी।  कभी कभी मन होता है कि तुम्ह...

जोड़े की आवाज़

कभी कभी दिमाग की नसों का धड़कना भी सुनाई देती है। घड़ी की टिक टिक की तरह बजती हुई। एक शांत शोर। सर्दी की एक शांत सुबह की तरह जब किसी अभौतिक बात पर सोच सकें। कि जैसे धूप में कुर्सी लगा कर बैठे हों और हाथ पर एक तितली मर्जी से आकर बैठ जाए। बिरंगी तितली। अपनी हर सांस के साथ पंखों को खोले और बंद करे। पंख जब खुले तो किसी कविता की किताब की जिल्द लगे। उनपर बनाने वाले की उम्दा कशीदाकारी हो। गोल गोल हाईलाटेड घेरे, साड़ी की काली किनारी, और थोड़ा ऊपर कभी नीला रंग घुलते तो कभी पीला... तो कभी रंगों में में कई रंग...। एक सपनीला संसार। जैसे पॉलिस करके खुद के रोज़ अपने घर से निकलती हो। अपने ऊपर की लिपस्टिक को और गाढ़ा करके लगाती हो। कभी जो हमारे उंगलियों को छू जाए एक कच्चा रंग हमारे हाथ पर रह जाए। उसका सिग्नेचर’.....  छूअन ऐसी जैसे किसी मेमने के कान.... कुछ चीज़ें सुभाव से ही हमारे मन को निर्मल बनाती हैं..... कुछ के पंख ऐसे होतें हैं जैसे सफेदी जा रही दीवार पर बैठी हो। उसकी तंद्रा भंग हुई हो वो उड़ने के लिए अपने पंखों का गत्ता खोली ही हो कि उस पर सफेदी के छींटे पड़ गए हों। कुछ के पंख ऐसे होते हैं - जै...